CTET PYQ Quiz
शिक्षक पात्रता परीक्षा मॉक टेस्ट
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पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।.
है अनिश्चित किस जगह पर,
सरित गिरि गह्वर मिलेंगे है
अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे।
किस जगह यात्रा खत्म हो
जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे।
कौन सहसा छू जाएँगे
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।
#1. कविता की पंक्तियों में यात्रा की किस विशेषता की ओर संकेत किया गया है?
#2. कविता में आए ‘सुमन और कंटक’ किस भाव के प्रतीक हैं?
पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।.
है अनिश्चित किस जगह पर,
सरित गिरि गह्वर मिलेंगे है
अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे।
किस जगह यात्रा खत्म हो
जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे।
कौन सहसा छू जाएँगे
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।
#3. कविता की पंक्तियों में कवि व्यक्ति को किस बात की प्रेरणा दे रहा है?
पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।.
है अनिश्चित किस जगह पर,
सरित गिरि गह्वर मिलेंगे है
अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे।
किस जगह यात्रा खत्म हो
जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे।
कौन सहसा छू जाएँगे
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।
#4. इस जीवन-यात्रा में-
पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।.
है अनिश्चित किस जगह पर,
सरित गिरि गह्वर मिलेंगे है
अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे।
किस जगह यात्रा खत्म हो
जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे।
कौन सहसा छू जाएँगे
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।
#5. नीचे दिए गए शब्दों में से ‘सरित’ का समानार्थी शब्द कौन-सा नहीं है?
पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।.
है अनिश्चित किस जगह पर,
सरित गिरि गह्वर मिलेंगे है
अनिश्चित किस जगह पर
बाग वन सुंदर मिलेंगे।
किस जगह यात्रा खत्म हो
जाएगी यह भी अनिश्चित
है अनिश्चित कब सुमन कब
कंटकों के शर मिलेंगे।
कौन सहसा छू जाएँगे
मिलेंगे कौन सहसा
आ पड़े कुछ भी रुकेगा
तू न ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के बटोही,
बाट की पहचान कर ले।
#6. ‘अनिश्चित’ शब्द में कौन-सा प्रत्यय आ सकता है?
राष्ट्रीय पर्वों और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ, कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगे खुद तुकबंदियां करने लगे रचने लगे, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वह उस राह से भटक जाएंगे जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुंचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वह वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं।उनके भीतर बच्चों के स्वतंत्रता पूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत -कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबक लिए समय कहाँ है। यह पाठ्य-पुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते है शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें।
दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगह थी वह जगह लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, ये अवसर ही गीत-कविताओं की गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इनमें कुछ जोड़ने के लिए प्रेरित करते थे। इसके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी , वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगह थीं।खेलने कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच में स्वतः ही नए खेल, तुकबंदियों और खेल -गीतों और बाल- गीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थी, जबान पर चढ़ जाती थीं और साली-साल उनकी टोलियों के बीच बनी रहती थी समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी।
#7. गीत-कविता बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ यह माता-पिता को पसंद नहीं है, क्योंकि इससे बच्चे –
राष्ट्रीय पर्वों और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ, कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगे खुद तुकबंदियां करने लगे रचने लगे, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वह उस राह से भटक जाएंगे जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुंचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वह वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं।उनके भीतर बच्चों के स्वतंत्रता पूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत -कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबक लिए समय कहाँ है। यह पाठ्य-पुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते है शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें।
दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगह थी वह जगह लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, ये अवसर ही गीत-कविताओं की गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इनमें कुछ जोड़ने के लिए प्रेरित करते थे। इसके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी , वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगह थीं।खेलने कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच में स्वतः ही नए खेल, तुकबंदियों और खेल -गीतों और बाल- गीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थी, जबान पर चढ़ जाती थीं और साली-साल उनकी टोलियों के बीच बनी रहती थी समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी।
#8. गीत-कविता स्कूलों को भी पसंद नहीं है, क्योंकि उन्हें लगता है कि-
राष्ट्रीय पर्वों और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ, कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगे खुद तुकबंदियां करने लगे रचने लगे, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वह उस राह से भटक जाएंगे जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुंचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वह वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं।उनके भीतर बच्चों के स्वतंत्रता पूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत -कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबक लिए समय कहाँ है। यह पाठ्य-पुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते है शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें।
दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगह थी वह जगह लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, ये अवसर ही गीत-कविताओं की गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इनमें कुछ जोड़ने के लिए प्रेरित करते थे। इसके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी , वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगह थीं।खेलने कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच में स्वतः ही नए खेल, तुकबंदियों और खेल -गीतों और बाल- गीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थी, जबान पर चढ़ जाती थीं और साली-साल उनकी टोलियों के बीच बनी रहती थी समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी।
#9. गीत-कविता के बारे में कौन-सा कथन सही नहीं है?
राष्ट्रीय पर्वों और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ, कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगे खुद तुकबंदियां करने लगे रचने लगे, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वह उस राह से भटक जाएंगे जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुंचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वह वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं।उनके भीतर बच्चों के स्वतंत्रता पूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत -कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबक लिए समय कहाँ है। यह पाठ्य-पुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते है शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें।
दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगह थी वह जगह लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, ये अवसर ही गीत-कविताओं की गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इनमें कुछ जोड़ने के लिए प्रेरित करते थे। इसके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी , वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगह थीं।खेलने कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच में स्वतः ही नए खेल, तुकबंदियों और खेल -गीतों और बाल- गीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थी, जबान पर चढ़ जाती थीं और साली-साल उनकी टोलियों के बीच बनी रहती थी समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी।
#10. शिक्षा-व्यवस्था गीत-कविता को किस दृष्टि से देखती है?
राष्ट्रीय पर्वों और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ, कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगे खुद तुकबंदियां करने लगे रचने लगे, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वह उस राह से भटक जाएंगे जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुंचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वह वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं।उनके भीतर बच्चों के स्वतंत्रता पूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत -कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबक लिए समय कहाँ है। यह पाठ्य-पुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते है शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें।
दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगह थी वह जगह लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, ये अवसर ही गीत-कविताओं की गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इनमें कुछ जोड़ने के लिए प्रेरित करते थे। इसके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी , वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगह थीं।खेलने कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच में स्वतः ही नए खेल, तुकबंदियों और खेल -गीतों और बाल- गीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थी, जबान पर चढ़ जाती थीं और साली-साल उनकी टोलियों के बीच बनी रहती थी समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी।
#11. अनुच्छेद के आधार पर गीत-कविता के बारे में कौन-सा कथन सही नहीं है?
राष्ट्रीय पर्वों और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ, कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगे खुद तुकबंदियां करने लगे रचने लगे, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वह उस राह से भटक जाएंगे जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुंचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वह वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं।उनके भीतर बच्चों के स्वतंत्रता पूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत -कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबक लिए समय कहाँ है। यह पाठ्य-पुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते है शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें।
दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगह थी वह जगह लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, ये अवसर ही गीत-कविताओं की गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इनमें कुछ जोड़ने के लिए प्रेरित करते थे। इसके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी , वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगह थीं।खेलने कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच में स्वतः ही नए खेल, तुकबंदियों और खेल -गीतों और बाल- गीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थी, जबान पर चढ़ जाती थीं और साली-साल उनकी टोलियों के बीच बनी रहती थी समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी।
#12. बच्चों के लिए लक्ष्य कौन निर्धारित करता है?
राष्ट्रीय पर्वों और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ, कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगे खुद तुकबंदियां करने लगे रचने लगे, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वह उस राह से भटक जाएंगे जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुंचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वह वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं।उनके भीतर बच्चों के स्वतंत्रता पूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत -कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबक लिए समय कहाँ है। यह पाठ्य-पुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते है शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें।
#13. ‘कविताएँ सुनी-सुनायी जाएँ’ में क्रिया है-
राष्ट्रीय पर्वों और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ, कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगे खुद तुकबंदियां करने लगे रचने लगे, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वह उस राह से भटक जाएंगे जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुंचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वह वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं।उनके भीतर बच्चों के स्वतंत्रता पूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत -कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबक लिए समय कहाँ है। यह पाठ्य-पुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते है शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें।
दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगह थी वह जगह लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, ये अवसर ही गीत-कविताओं की गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इनमें कुछ जोड़ने के लिए प्रेरित करते थे। इसके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी , वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगह थीं।खेलने कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच में स्वतः ही नए खेल, तुकबंदियों और खेल -गीतों और बाल- गीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थी, जबान पर चढ़ जाती थीं और साली-साल उनकी टोलियों के बीच बनी रहती थी समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी।
#14. ‘सांस्कृतिक’ में प्रत्यय है-
राष्ट्रीय पर्वों और सांस्कृतिक समारोहों के दौरान गीत गाए जाएँ, कविताएँ सुनी और सुनायी जाएँ, इसे लेकर माता-पिताओं, स्कूल और समाज में व्यापक सहमति है लेकिन गीत-कविताएँ बच्चों के जीवन में रच-बस जाएँ, वे उनका भरपूर आनंद लेने लगे खुद तुकबंदियां करने लगे रचने लगे, यह माता-पिता को मंजूर नहीं। माता को लगता है ऐसा करते हुए तो वह उस राह से भटक जाएंगे जिस राह से वे उन्हें अपनी सोची हुई मंजिल पर पहुंचाना चाहते हैं। उनकी इस इच्छा में यह निहित है कि बच्चे वैसा कुछ भी नहीं करें जो वे करना चाहते हैं बल्कि वह वैसा करें जैसा माता-पिता चाहते हैं।उनके भीतर बच्चों के स्वतंत्रता पूर्वक सीखने की प्रक्रिया के प्रति सतत संदेह और गहरा डर बना रहता है। यही हाल स्कूल का भी है। गीत -कविता स्कूल और कक्षाओं की रोजमर्रा की गतिविधि का हिस्सा बन जाए यह स्कूल को मंजूर नहीं। स्कूल को लगता है इस सबक लिए समय कहाँ है। यह पाठ्य-पुस्तक से बाहर की गतिविधि है। शिक्षक और शिक्षा अधिकारी चाहते है शिक्षक पहले परीक्षा परिणाम बेहतर लाने के लिए काम करें।
दूसरी ओर हमारी संस्कृति और समाज में गीत-कविता की जो जगह थी वह जगह लगातार सीमित हुई हैं। गीत गाने, सुनने-सुनाने के अवसर हुआ करते थे, ये अवसर ही गीत-कविताओं की गुनगुनाते रह सकने के लिए याद करने को प्रेरित करते थे। सहेजने और रचने के लिए प्रेरित करते थे। इनमें कुछ जोड़ने के लिए प्रेरित करते थे। इसके लिए अतिरिक्त प्रयासों की जरूरत नहीं पड़ती थी , वह जीवन-शैली का स्वाभाविक हिस्सा था। बच्चों के लिए पढ़ाई से अधिक खेलने-कूदने के लिए समय और जगह थीं।खेलने कूदने की मस्ती के दौरान ही उनके बीच में स्वतः ही नए खेल, तुकबंदियों और खेल -गीतों और बाल- गीतों का सृजन भी हो जाया करता था। उनकी ये रचनाएँ चलन में आ जाया करती थी, जबान पर चढ़ जाती थीं और साली-साल उनकी टोलियों के बीच बनी रहती थी समय के साथ उनमें कुछ कमी पाए जाने पर संशोधित होती रहती थी।
#15. ‘मंजूर’ का समानार्थी शब्द है-
#16. प्राथमिक स्तर पर हिंदी भाषा सिखाने के लिए सबसे अधिक जरूरी है-
#17. बच्चे बोल-चाल की भाषा का अनुभव लेकर विद्यालय आते हैं। इसका निहितार्थ है कि-
#18. भाषा सीखने-सिखाने में आप किसे सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं?
#19. हिंदी भाषा शिक्षक का यह प्रयास होना चाहिए कि वे-
#20. .………भाषा का अति महत्वपूर्ण प्रकार्य है।
#21. सुनने और लिखने की कुशलता का आकलन करने का सबसे अच्छा तरीका है-
#22. सार्थक पढ़ते समय कभी-कभी वाक्यों, शब्दों की कुनरावृत्ति करता है। यह भाषायी व्यवहार दर्शाता कि
#23. हिंदी भाषा में आकलन का उद्देश्य नहीं है-
#24. आपके विचार से प्राथमिक स्तर पर उत्कृश लेखन कार्य का उदाहरण है-?
#25. भाषा सीखने के संदर्भ में कौन-सा कथन सही है?
#26. डिस्ग्राफिया से प्रभावित बच्खों को मुख्य रूप से में………कठिनाई होती है।
#27. प्राथमिक स्तर की हिंदी भाषा की पाठ्य-पुस्तक में आप किसे सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते है।
#28. बहुभाषिक कक्षा में बच्चों की भाषाएँ-
#29. भाषा सीखने और भाषा अर्जित करने में अंतर का मुख्य आधार है-
#30. कक्षा पाँच के बच्चों के भाषा आकलन के संदर्भ में आप किस सवाल को सबसे कमजोर मानते हैं?
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