CTET December 19 Paper 1 भाषा – I हिन्दी

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आधुनिक शिक्षा का नतीजा हमने देख लिया । हमने उस शिक्षा का नतीजा भी देख लिया, जिसमें ‘विकसित विज्ञान’ का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिसके कारण व्यक्ति को कहीं भी या कितना भी मिलने के बावजूद तृप्ति नहीं होती। इसका कारण यही है कि शिक्षा के स्वाभाविक और आवश्यक अंगों को छोड़कर हमने ऐसे विषयों पर अधिक ध्यान दिया, जो मनुष्य का एकतरफा विकास करते हैं, जिनके कारण व्यक्तित्व का बड़े-से-बड़ा भाग अतृप्त रह जाता है। बाल्यावस्था में भी कला-शिक्षा को अभी तक उचित स्थान नहीं मिला है। जहाँ मिलता भी है, वहाँ बच्चा ग्यारह बारह वर्ष का होते ही उसके शिक्षा-क्रम में से कला-प्रवृत्तियों को निकाल दिया जाता है। ऐसा ही हर्बर्ट रीड ने कहा है:

“हमारा अनुभव हमें बताता है कि हर व्यक्ति ग्यारह साल की उम्र के बाद, किशोर अवस्था और उसके बाद भी सारे जीवन काल तक किसी-न-किसी कला-प्रवृत्ति को अपने भाव-प्रकटन का जरिया बनाये रख सकता है। आज के सभी विषय जिन पर हम अपनी एकमात्र श्रद्धा करते हैं, जैसे गणित, भूगोल, इतिहास, रसायनशास्त्र और यहाँ तक कि साहित्य भी जिस तरह पढ़ाये जाते हैं, उन सबकी बुनियाद तार्किक है। इन पर एकमात्र जोर देने के कारण कला-प्रवृत्तियाँ, जो भावना-प्रधान होती हैं, पाठ्यक्रम से करीब-करीब निकल जाती हैं। ये प्रवृत्तियाँ केवल पाठ्यक्रम से ही नहीं निकल जातीं,

बल्कि इन तार्किक विषयों को महत्त्व देने के कारण व्यक्ति के दिमाग से भी बिलकुल निकल जाती हैं। किशोर-अवस्था को इस तरह गलत रास्ते पर ले जाने का नतीजा भयानक हो रहा है। सभ्यता रोज-ब-रोज बेढब होती जा रही है। व्यक्ति का गलत विकास हो रहा है। उसका मानस अस्वस्थ है, परिवार दुखी है। समाज में फूट पड़ी है और दुनिया पर ध्वंस करने का ज्वर चढ़ा है। इन भयानक अवस्थाओं को हमारा ज्ञान-विज्ञान सहारा दे रहा है। आज की तालीम भी इसी दौड़ में साथ दे रही है।”

#1. अनुच्छेद के आधार पर हमें किस पर सर्वाधिक ध्यान देने की जरूरत है ?

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आधुनिक शिक्षा का नतीजा हमने देख लिया । हमने उस शिक्षा का नतीजा भी देख लिया, जिसमें ‘विकसित विज्ञान’ का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिसके कारण व्यक्ति को कहीं भी या कितना भी मिलने के बावजूद तृप्ति नहीं होती। इसका कारण यही है कि शिक्षा के स्वाभाविक और आवश्यक अंगों को छोड़कर हमने ऐसे विषयों पर अधिक ध्यान दिया, जो मनुष्य का एकतरफा विकास करते हैं, जिनके कारण व्यक्तित्व का बड़े-से-बड़ा भाग अतृप्त रह जाता है। बाल्यावस्था में भी कला-शिक्षा को अभी तक उचित स्थान नहीं मिला है। जहाँ मिलता भी है, वहाँ बच्चा ग्यारह बारह वर्ष का होते ही उसके शिक्षा-क्रम में से कला-प्रवृत्तियों को निकाल दिया जाता है। ऐसा ही हर्बर्ट रीड ने कहा है:

“हमारा अनुभव हमें बताता है कि हर व्यक्ति ग्यारह साल की उम्र के बाद, किशोर अवस्था और उसके बाद भी सारे जीवन काल तक किसी-न-किसी कला-प्रवृत्ति को अपने भाव-प्रकटन का जरिया बनाये रख सकता है। आज के सभी विषय जिन पर हम अपनी एकमात्र श्रद्धा करते हैं, जैसे गणित, भूगोल, इतिहास, रसायनशास्त्र और यहाँ तक कि साहित्य भी जिस तरह पढ़ाये जाते हैं, उन सबकी बुनियाद तार्किक है। इन पर एकमात्र जोर देने के कारण कला-प्रवृत्तियाँ, जो भावना-प्रधान होती हैं, पाठ्यक्रम से करीब-करीब निकल जाती हैं। ये प्रवृत्तियाँ केवल पाठ्यक्रम से ही नहीं निकल जातीं,

बल्कि इन तार्किक विषयों को महत्त्व देने के कारण व्यक्ति के दिमाग से भी बिलकुल निकल जाती हैं। किशोर-अवस्था को इस तरह गलत रास्ते पर ले जाने का नतीजा भयानक हो रहा है। सभ्यता रोज-ब-रोज बेढब होती जा रही है। व्यक्ति का गलत विकास हो रहा है। उसका मानस अस्वस्थ है, परिवार दुखी है। समाज में फूट पड़ी है और दुनिया पर ध्वंस करने का ज्वर चढ़ा है। इन भयानक अवस्थाओं को हमारा ज्ञान-विज्ञान सहारा दे रहा है। आज की तालीम भी इसी दौड़ में साथ दे रही है।”

#2. अनुच्छेद के अनुसार गणित, भूगोल, इतिहास आदि विषय

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आधुनिक शिक्षा का नतीजा हमने देख लिया । हमने उस शिक्षा का नतीजा भी देख लिया, जिसमें ‘विकसित विज्ञान’ का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिसके कारण व्यक्ति को कहीं भी या कितना भी मिलने के बावजूद तृप्ति नहीं होती। इसका कारण यही है कि शिक्षा के स्वाभाविक और आवश्यक अंगों को छोड़कर हमने ऐसे विषयों पर अधिक ध्यान दिया, जो मनुष्य का एकतरफा विकास करते हैं, जिनके कारण व्यक्तित्व का बड़े-से-बड़ा भाग अतृप्त रह जाता है। बाल्यावस्था में भी कला-शिक्षा को अभी तक उचित स्थान नहीं मिला है। जहाँ मिलता भी है, वहाँ बच्चा ग्यारह बारह वर्ष का होते ही उसके शिक्षा-क्रम में से कला-प्रवृत्तियों को निकाल दिया जाता है। ऐसा ही हर्बर्ट रीड ने कहा है:

“हमारा अनुभव हमें बताता है कि हर व्यक्ति ग्यारह साल की उम्र के बाद, किशोर अवस्था और उसके बाद भी सारे जीवन काल तक किसी-न-किसी कला-प्रवृत्ति को अपने भाव-प्रकटन का जरिया बनाये रख सकता है। आज के सभी विषय जिन पर हम अपनी एकमात्र श्रद्धा करते हैं, जैसे गणित, भूगोल, इतिहास, रसायनशास्त्र और यहाँ तक कि साहित्य भी जिस तरह पढ़ाये जाते हैं, उन सबकी बुनियाद तार्किक है। इन पर एकमात्र जोर देने के कारण कला-प्रवृत्तियाँ, जो भावना-प्रधान होती हैं, पाठ्यक्रम से करीब-करीब निकल जाती हैं। ये प्रवृत्तियाँ केवल पाठ्यक्रम से ही नहीं निकल जातीं,

बल्कि इन तार्किक विषयों को महत्त्व देने के कारण व्यक्ति के दिमाग से भी बिलकुल निकल जाती हैं। किशोर-अवस्था को इस तरह गलत रास्ते पर ले जाने का नतीजा भयानक हो रहा है। सभ्यता रोज-ब-रोज बेढब होती जा रही है। व्यक्ति का गलत विकास हो रहा है। उसका मानस अस्वस्थ है, परिवार दुखी है। समाज में फूट पड़ी है और दुनिया पर ध्वंस करने का ज्वर चढ़ा है। इन भयानक अवस्थाओं को हमारा ज्ञान-विज्ञान सहारा दे रहा है। आज की तालीम भी इसी दौड़ में साथ दे रही है।”

#3. ज्ञान-विज्ञान को बहुत अधिक महत्त्व देने के कारण (

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See also  महत्वपूर्ण सूचकांक एवं भारत का स्थान 2024- 25

“हमारा अनुभव हमें बताता है कि हर व्यक्ति ग्यारह साल की उम्र के बाद, किशोर अवस्था और उसके बाद भी सारे जीवन काल तक किसी-न-किसी कला-प्रवृत्ति को अपने भाव-प्रकटन का जरिया बनाये रख सकता है। आज के सभी विषय जिन पर हम अपनी एकमात्र श्रद्धा करते हैं, जैसे गणित, भूगोल, इतिहास, रसायनशास्त्र और यहाँ तक कि साहित्य भी जिस तरह पढ़ाये जाते हैं, उन सबकी बुनियाद तार्किक है। इन पर एकमात्र जोर देने के कारण कला-प्रवृत्तियाँ, जो भावना-प्रधान होती हैं, पाठ्यक्रम से करीब-करीब निकल जाती हैं। ये प्रवृत्तियाँ केवल पाठ्यक्रम से ही नहीं निकल जातीं,

बल्कि इन तार्किक विषयों को महत्त्व देने के कारण व्यक्ति के दिमाग से भी बिलकुल निकल जाती हैं। किशोर-अवस्था को इस तरह गलत रास्ते पर ले जाने का नतीजा भयानक हो रहा है। सभ्यता रोज-ब-रोज बेढब होती जा रही है। व्यक्ति का गलत विकास हो रहा है। उसका मानस अस्वस्थ है, परिवार दुखी है। समाज में फूट पड़ी है और दुनिया पर ध्वंस करने का ज्वर चढ़ा है। इन भयानक अवस्थाओं को हमारा ज्ञान-विज्ञान सहारा दे रहा है। आज की तालीम भी इसी दौड़ में साथ दे रही है।”

#4. किशोरावस्था तार्किकता की प्रधानता और भाव के अभाव में का रास्ता अपना रही है।

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आधुनिक शिक्षा का नतीजा हमने देख लिया । हमने उस शिक्षा का नतीजा भी देख लिया, जिसमें ‘विकसित विज्ञान’ का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिसके कारण व्यक्ति को कहीं भी या कितना भी मिलने के बावजूद तृप्ति नहीं होती। इसका कारण यही है कि शिक्षा केस्वाभाविक और आवश्यक अंगों को छोड़कर हमने ऐसे विषयों पर अधिक ध्यान दिया, जो मनुष्य का एकतरफा विकास करते हैं, जिनके कारण व्यक्तित्व का बड़े-से-बड़ा भाग अतृप्त रह जाता है। बाल्यावस्था में भी कला-शिक्षा को अभी तक उचित स्थान नहीं मिला है। जहाँ मिलता भी है, वहाँ बच्चा ग्यारह बारह वर्ष का होते ही उसके शिक्षा-क्रम में से कला-प्रवृत्तियों को निकाल दिया जाता है। ऐसा ही हर्बर्ट रीड ने कहा है:

“हमारा अनुभव हमें बताता है कि हर व्यक्ति ग्यारह साल की उम्र के बाद, किशोर अवस्था और उसके बाद भी सारे जीवन काल तक किसी-न-किसी कला-प्रवृत्ति को अपने भाव-प्रकटन का जरिया बनाये रख सकता है। आज के सभी विषय जिन पर हम अपनी एकमात्र श्रद्धा करते हैं, जैसे गणित, भूगोल, इतिहास, रसायनशास्त्र और यहाँ तक कि साहित्य भी जिस तरह पढ़ाये जाते हैं, उन सबकी बुनियाद तार्किक है। इन पर एकमात्र जोर देने के कारण कला-प्रवृत्तियाँ, जो भावना-प्रधान होती हैं, पाठ्यक्रम से करीब-करीब निकल जाती हैं। ये प्रवृत्तियाँ केवल पाठ्यक्रम से ही नहीं निकल जातीं,

बल्कि इन तार्किक विषयों को महत्त्व देने के कारण व्यक्ति के दिमाग से भी बिलकुल निकल जाती हैं। किशोर-अवस्था को इस तरह गलत रास्ते पर ले जाने का नतीजा भयानक हो रहा है। सभ्यता रोज-ब-रोज बेढब होती जा रही है। व्यक्ति का गलत विकास हो रहा है। उसका मानस अस्वस्थ है, परिवार दुखी है। समाज में फूट पड़ी है और दुनिया पर ध्वंस करने का ज्वर चढ़ा है। इन भयानक अवस्थाओं को हमारा ज्ञान-विज्ञान सहारा दे रहा है। आज की तालीम भी इसी दौड़ में साथ दे रही है।”

#5. इनमें से कौन सा शब्द समूह से भिन्न है ?




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आधुनिक शिक्षा का नतीजा हमने देख लिया । हमने उस शिक्षा का नतीजा भी देख लिया, जिसमें ‘विकसित विज्ञान’ का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिसके कारण व्यक्ति को कहीं भी या कितना भी मिलने के बावजूद तृप्ति नहीं होती। इसका कारण यही है कि शिक्षा के स्वाभाविक और आवश्यक अंगों को छोड़कर हमने ऐसे विषयों पर अधिक ध्यान दिया, जो मनुष्य का एकतरफा विकास करते हैं, जिनके कारण व्यक्तित्व का बड़े-से-बड़ा भाग अतृप्त रह जाता है। बाल्यावस्था में भी कला-शिक्षा को अभी तक उचित स्थान नहीं मिला है। जहाँ मिलता भी है, वहाँ बच्चा ग्यारह बारह वर्ष का होते ही उसके शिक्षा-क्रम में से कला-प्रवृत्तियों को निकाल दिया जाता है। ऐसा ही हर्बर्ट रीड ने कहा है:

“हमारा अनुभव हमें बताता है कि हर व्यक्ति ग्यारह साल की उम्र के बाद, किशोर अवस्था और उसके बाद भी सारे जीवन काल तक किसी-न-किसी कला-प्रवृत्ति को अपने भाव-प्रकटन का जरिया बनाये रख सकता है। आज के सभी विषय जिन पर हम अपनी एकमात्र श्रद्धा करते हैं, जैसे गणित, भूगोल, इतिहास, रसायनशास्त्र और यहाँ तक कि साहित्य भी जिस तरह पढ़ाये जाते हैं, उन सबकी बुनियाद तार्किक है। इन पर एकमात्र जोर देने के कारण कला-प्रवृत्तियाँ, जो भावना-प्रधान होती हैं, पाठ्यक्रम से करीब-करीब निकल जाती हैं। ये प्रवृत्तियाँ केवल पाठ्यक्रम से ही नहीं निकल जातीं,

बल्कि इन तार्किक विषयों को महत्त्व देने के कारण व्यक्ति के दिमाग से भी बिलकुल निकल जाती हैं। किशोर-अवस्था को इस तरह गलत रास्ते पर ले जाने का नतीजा भयानक हो रहा है। सभ्यता रोज-ब-रोज बेढब होती जा रही है। व्यक्ति का गलत विकास हो रहा है। उसका मानस अस्वस्थ है, परिवार दुखी है। समाज में फूट पड़ी है और दुनिया पर ध्वंस करने का ज्वर चढ़ा है। इन भयानक अवस्थाओं को हमारा ज्ञान-विज्ञान सहारा दे रहा है। आज की तालीम भी इसी दौड़ में साथ दे रही है।”

#6. ‘आज की तालीम भी इसी दौड़ में साथ दे रही है।’ वाक्य में निपात है

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आधुनिक शिक्षा का नतीजा हमने देख लिया । हमने उस शिक्षा का नतीजा भी देख लिया, जिसमें ‘विकसित विज्ञान’ का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिसके कारण व्यक्ति को कहीं भी या कितना भी मिलने के बावजूद तृप्ति नहीं होती। इसका कारण यही है कि शिक्षा के स्वाभाविक और आवश्यक अंगों को छोड़कर हमने ऐसे विषयों पर अधिक ध्यान दिया, जो मनुष्य का एकतरफा विकास करते हैं, जिनके कारण व्यक्तित्व का बड़े-से-बड़ा भाग अतृप्त रह जाता है। बाल्यावस्था में भी कला-शिक्षा को अभी तक उचित स्थान नहीं मिला है। जहाँ मिलता भी है, वहाँ बच्चा ग्यारह बारह वर्ष का होते ही उसके शिक्षा-क्रम में से कला-प्रवृत्तियों को निकाल दिया जाता है। ऐसा ही हर्बर्ट रीड ने कहा है:

“हमारा अनुभव हमें बताता है कि हर व्यक्ति ग्यारह साल की उम्र के बाद, किशोर अवस्था और उसके बाद भी सारे जीवन काल तक किसी-न-किसी कला-प्रवृत्ति को अपने भाव-प्रकटन का जरिया बनाये रख सकता है। आज के सभी विषय जिन पर हम अपनी एकमात्र श्रद्धा करते हैं, जैसे गणित, भूगोल, इतिहास, रसायनशास्त्र और यहाँ तक कि साहित्य भी जिस तरह पढ़ाये जाते हैं, उन सबकी बुनियाद तार्किक है। इन पर एकमात्र जोर देने के कारण कला-प्रवृत्तियाँ, जो भावना-प्रधान होती हैं, पाठ्यक्रम से करीब-करीब निकल जाती हैं। ये प्रवृत्तियाँ केवल पाठ्यक्रम से ही नहीं निकल जातीं,

See also  CTET December 2018 Paper 1 Language 2 English

बल्कि इन तार्किक विषयों को महत्त्व देने के कारण व्यक्ति के दिमाग से भी बिलकुल निकल जाती हैं। किशोर-अवस्था को इस तरह गलत रास्ते पर ले जाने का नतीजा भयानक हो रहा है। सभ्यता रोज-ब-रोज बेढब होती जा रही है। व्यक्ति का गलत विकास हो रहा है। उसका मानस अस्वस्थ है, परिवार दुखी है। समाज में फूट पड़ी है और दुनिया पर ध्वंस करने का ज्वर चढ़ा है। इन भयानक अवस्थाओं को हमारा ज्ञान-विज्ञान सहारा दे रहा है। आज की तालीम भी इसी दौड़ में साथ दे रही है।”

#7. ‘विकसित’ शब्द में प्रत्यय है

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“हमारा अनुभव हमें बताता है कि हर व्यक्ति ग्यारह साल की उम्र के बाद, किशोर अवस्था और उसके बाद भी सारे जीवन काल तक किसी-न-किसी कला-प्रवृत्ति को अपने भाव-प्रकटन का जरिया बनाये रख सकता है। आज के सभी विषय जिन पर हम अपनी एकमात्र श्रद्धा करते हैं, जैसे गणित, भूगोल, इतिहास, रसायनशास्त्र और यहाँ तक कि साहित्य भी जिस तरह पढ़ाये जाते हैं, उन सबकी बुनियाद तार्किक है। इन पर एकमात्र जोर देने के कारण कला-प्रवृत्तियाँ, जो भावना-प्रधान होती हैं, पाठ्यक्रम से करीब-करीब निकल जाती हैं। ये प्रवृत्तियाँ केवल पाठ्यक्रम से ही नहीं निकल जातीं,

बल्कि इन तार्किक विषयों को महत्त्व देने के कारण व्यक्ति के दिमाग से भी बिलकुल निकल जाती हैं। किशोर-अवस्था को इस तरह गलत रास्ते पर ले जाने का नतीजा भयानक हो रहा है। सभ्यता रोज-ब-रोज बेढब होती जा रही है। व्यक्ति का गलत विकास हो रहा है। उसका मानस अस्वस्थ है, परिवार दुखी है। समाज में फूट पड़ी है और दुनिया पर ध्वंस करने का ज्वर चढ़ा है। इन भयानक अवस्थाओं को हमारा ज्ञान-विज्ञान सहारा दे रहा है। आज की तालीम भी इसी दौड़ में साथ दे रही है।”

#8. अनुच्छेद के आधार पर कहा जा सकता है कि आधुनिक शिक्षा का नतीजा

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आधुनिक शिक्षा का नतीजा हमने देख लिया । हमने उस शिक्षा का नतीजा भी देख लिया, जिसमें ‘विकसित विज्ञान’ का सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान है, जिसके कारण व्यक्ति को कहीं भी या कितना भी मिलने के बावजूद तृप्ति नहीं होती। इसका कारण यही है कि शिक्षा के स्वाभाविक और आवश्यक अंगों को छोड़कर हमने ऐसे विषयों पर अधिक ध्यान दिया, जो मनुष्य का एकतरफा विकास करते हैं, जिनके कारण व्यक्तित्व का बड़े-से-बड़ा भाग अतृप्त रह जाता है। बाल्यावस्था में भी कला-शिक्षा को अभी तक उचित स्थान नहीं मिला है। जहाँ मिलता भी है, वहाँ बच्चा ग्यारह बारह वर्ष का होते ही उसके शिक्षा-क्रम में से कला-प्रवृत्तियों को निकाल दिया जाता है। ऐसा ही हर्बर्ट रीड ने कहा है:

“हमारा अनुभव हमें बताता है कि हर व्यक्ति ग्यारह साल की उम्र के बाद, किशोर अवस्था और उसके बाद भी सारे जीवन काल तक किसी-न-किसी कला-प्रवृत्ति को अपने भाव-प्रकटन का जरिया बनाये रख सकता है। आज के सभी विषय जिन पर हम अपनी एकमात्र श्रद्धा करते हैं, जैसे गणित, भूगोल, इतिहास, रसायनशास्त्र और यहाँ तक कि साहित्य भी जिस तरह पढ़ाये जाते हैं, उन सबकी बुनियाद तार्किक है। इन पर एकमात्र जोर देने के कारण कला-प्रवृत्तियाँ, जो भावना-प्रधान होती हैं, पाठ्यक्रम से करीब-करीब निकल जाती हैं। ये प्रवृत्तियाँ केवल पाठ्यक्रम से ही नहीं निकल जातीं,

बल्कि इन तार्किक विषयों को महत्त्व देने के कारण व्यक्ति के दिमाग से भी बिलकुल निकल जाती हैं। किशोर-अवस्था को इस तरह गलत रास्ते पर ले जाने का नतीजा भयानक हो रहा है। सभ्यता रोज-ब-रोज बेढब होती जा रही है। व्यक्ति का गलत विकास हो रहा है। उसका मानस अस्वस्थ है, परिवार दुखी है। समाज में फूट पड़ी है और दुनिया पर ध्वंस करने का ज्वर चढ़ा है। इन भयानक अवस्थाओं को हमारा ज्ञान-विज्ञान सहारा दे रहा है। आज की तालीम भी इसी दौड़ में साथ दे रही है।”

#9. आधुनिक शिक्षा में किस विषय को सबसे अधिक महत्त्व दिया जाता है ?

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साकार, दिव्य गौरव विराट !

 पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल !

 मेरी जननी के हिमकिरीट !

 मेरे भारत के दिव्य भाल !

                  मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

                             युग-युग अजेय, निर्बंध, मुक्त, 

                          युग-युग गर्वोन्नत नित महान,

                         निस्सीम व्योम में तान रहे,

                         युग से किस महिमा का वितान ? 

कैसी अखंड यह चिर समाधि ?  

यतिवर ! कैसा यह अमर ध्यान ?     

 तू महाशून्य में खोज रहा 

किस जटिल समस्या का निदान ?

                         उलझन का कैसा विषम-जाल

                             मेरे नगपति! मेरे विशाल !

 

#10. ‘हिमकिरीट’ का आशय है




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साकार, दिव्य गौरव विराट !

 पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल !

 मेरी जननी के हिमकिरीट !

 मेरे भारत के दिव्य भाल !

                  मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

                            युग-युग अजेय, निर्बंध, मुक्त, 

                          युग-युग गर्वोन्नत नित महान,

                         निस्सीम व्योम में तान रहे,

                         युग से किस महिमा का वितान ? 

कैसी अखंड यह चिर समाधि ?  

यतिवर ! कैसा यह अमर ध्यान ?     

 तू महाशून्य में खोज रहा 

किस जटिल समस्या का निदान ?

                       उलझन का कैसा विषम-जाल

                             मेरे नगपति! मेरे विशाल !

#11. ‘नगपति’ का विग्रह और समास होगा

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साकार, दिव्य गौरव विराट !

See also  CTET December 2018 Paper 2 सामाजिक अध्ययन/सामाजिक विज्ञान

 पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल !

 मेरी जननी के हिमकिरीट !

 मेरे भारत के दिव्य भाल !

                   मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

                             युग-युग अजेय, निर्बंध, मुक्त, 

                          युग-युग गर्वोन्नत नित महान,

                         निस्सीम व्योम में तान रहे,

                         युग से किस महिमा का वितान ? 

कैसी अखंड यह चिर समाधि ?  

यतिवर ! कैसा यह अमर ध्यान ?     

 तू महाशून्य में खोज रहा 

किस जटिल समस्या का निदान ?

                        उलझन का कैसा विषम-जाल

                             मेरे नगपति! मेरे विशाल !

#12. किस पंक्ति में कहा गया है कि हिमालय शक्ति की ज्वालाओं का ढेर है ?

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साकार, दिव्य गौरव विराट !

 पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल !

 मेरी जननी के हिमकिरीट !

 मेरे भारत के दिव्य भाल !

                    मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

                            युग-युग अजेय, निर्बंध, मुक्त, 

                          युग-युग गर्वोन्नत नित महान,

                         निस्सीम व्योम में तान रहे,

                         युग से किस महिमा का वितान ? 

कैसी अखंड यह चिर समाधि ?  

यतिवर ! कैसा यह अमर ध्यान ?     

 तू महाशून्य में खोज रहा 

किस जटिल समस्या का निदान ?

                          उलझन का कैसा विषम-जाल

                             मेरे नगपति! मेरे विशाल !

 

#13. ‘जिसे जीता न जा सके’ उसके लिए कविता में कौन सा शब्द प्रयुक्त हुआ है ?

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साकार, दिव्य गौरव विराट !

 पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल !

 मेरी जननी के हिमकिरीट !

 मेरे भारत के दिव्य भाल !

                    मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

                            युग-युग अजेय, निर्बंध, मुक्त, 

                          युग-युग गर्वोन्नत नित महान,

                         निस्सीम व्योम में तान रहे,

                         युग से किस महिमा का वितान ? 

कैसी अखंड यह चिर समाधि ?  

यतिवर ! कैसा यह अमर ध्यान ?     

 तू महाशून्य में खोज रहा 

किस जटिल समस्या का निदान ?

                         उलझन का कैसा विषम-जाल

                             मेरे नगपति! मेरे विशाल !

#14. ‘निस्सीम’ शब्द में कौन सी संधि है ?

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साकार, दिव्य गौरव विराट !

 पौरुष के पुंजीभूत ज्वाल !

 मेरी जननी के हिमकिरीट !

 मेरे भारत के दिव्य भाल !

                  मेरे नगपति ! मेरे विशाल !

                         युग-युग अजेय, निर्बंध, मुक्त, 

                          युग-युग गर्वोन्नत नित महान,

                         निस्सीम व्योम में तान रहे,

                         युग से किस महिमा का वितान ? 

कैसी अखंड यह चिर समाधि ?  

यतिवर ! कैसा यह अमर ध्यान ?     

 तू महाशून्य में खोज रहा 

किस जटिल समस्या का निदान

                         उलझन का कैसा विषम-जाल

                             मेरे नगपति! मेरे विशाल !

#15. हिमालय को ‘यतिवर’ ! कहकर संबोधित किया गया है, क्योंकि वह।




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#16. प्राथमिक स्तर पर बच्चों की भाषा का आकलन करने का उद्देश्य है ।

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#17. इनमें से कौन सा भाषा-आकलन में सबसे कम प्रभावी तरीका है ?

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#18. आकलन की प्रक्रिया में केवल बच्चे की क्षमताओं का आकलन नहीं होता बल्कि शिक्षक की शिक्षण-प्रक्रिया का भी आकलन होता है। यह विचार

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#19. रीमा ने तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली ऋतिका की भाषा-क्षमता, भाषा-निष्पादन संबंधी क्रमिक प्रगति का ब्यौरा उसके अभिभावकों को दिया । रीमा ने ,…………..के आधार पर यह जानकारी दी।

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#20. पहली कक्षा में आता है। भी लिखना के अंतर्गत




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#21. प्राथमिक स्तर पर पढ़ना सीखने में सबसे कम महत्त्वपूर्ण है

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#22. भाषा अर्जन क्षमता’ किसके साथ संबंधित है ?

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#23. .प्राथमिक स्तर पर भाषा सीखने में भाषा संबंधी कौन सा संसाधन सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है ?

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#24. बहु-भाषिकता हमारी पहचान भी है और हमारी ………………..व …………..का अभिन्न अंग भी ।

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#25. प्राथमिक स्तर की पाठ्य-पुस्तक में कार्टून, भाषण, विज्ञापन आदि बच्चों के भाषा-क्षमता विकास में हैं।




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#26. पाँचवीं कक्षा की सुहानी ‘पाँचौं, किन्हें, आँखें, दोनों’ आदि शब्द लिखती है। आप सुहानी के लेखन क्षमता के बारे में क्या कहेंगे ?

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#27. पाँचवीं कक्षा की सुहानी ‘पाँचौं, किन्हें, आँखें, दोनों’ आदि शब्द लिखती है। आप सुहानी के लेखन क्षमता के बारे में क्या कहेंगे ?

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#28. . विद्यालय में भाषा शिक्षण के लिए कोई कार्यक्रम शुरू करते समय सबसे महत्त्वपूर्ण है

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#29. . कई बार बच्चे जब स्कूल आते हैं तो दो या तीन भाषाओं को……………और बोलने की क्षमता से लैस होते हैं।

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#30. . किसी विषय को सीखने का मतलब है उसकी सीखना। को सीखना, उसकी को , विषय-वस्तु




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